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Love Pyar Bhare

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हमारे लिए उनके दिल में चाहत ना थी ,
किसी ख़ुशी में कोई दावत ना थी ,
हमने दिल उनके कदमों में रख दिया ,
पर उन्हें ज़मीन देखने की आदत ना थी।


Khile gulab ka murjhana bura lagta hai,
Mohabat ka yu mar jana bura lagta hai..!

Fasle mitana achhi baat hai ,
par kisi or ka unke nazdik jana bura lagta hai..!

Yu to chalti hai hawa roz fizao me,
Par uska-unko chhu kar guzar jana bura lagta hai..!

Unki hansi hai hume sabse pyari ,
Par unka kisi ko dekhar muskarna bura lagta hai..!

Intzar me unke bita denge sari zindgi,
Lekin unka yu milke bichhad jana bura lagta hai..!

Keh to dete hai hum roz bewafa unko ,
Par kisi or ka un pe ilzam lagana bura lagta hai..!

Wo naam tak na le humara zndgi bhar gam nhi,
Par na jane kyu unke labo pe kisi or ka naam ana bura lagta hai?


चलेगी जब तेरी यादों की पुरवाई तो क्या होगा
पुरानी चोट कोई फिर उभर आई तो क्या होगा,

मुहब्बत ख़ुद ही बन बैठी तमाशाई तो क्या होगा
न हम होंगे, न तुम होंगे, न तनहाई तो क्या होगा,

मुहब्बत की झुलसती धूप और काँटों भरे रस्ते
तुम्हारी याद नंगे पाँव गर आई तो क्या होगा,

ऐ मेरे दिल तू उनके पास जाता है तो जा, लेकिन
तबीअत उनसे मिलकर और घबराई तो क्या होगा,

लबों पर हमने नक़ली मुस्कराहट ओढ़ तो ली है
किसी ने पढ़ ली चेह्रे से जो सच्चाई तो क्या होगा,

सुना तो दूँ मुहब्बत की कहानी मैं तुम्हें लेकिन
तुम्हारी आँख भी ऐ दोस्त भर आई तो क्या होगा,

ख़ुदा के वास्ते अब तो परखना छोड़ दे मुझको
अगर कर दी किसी ने तेरी भरपाई तो क्या होगा..


(Ghazal) Aap Ka Aitbaar Kaun Kare
aap ka aitibaar kaun kare
roz ka intizaar kaun kare

zikr-e-mehr-o-vafaa to hum karte
phir tumhein sharmsaar kaun kare

ho jo us chashm-e-mast se bekhud
phir use hoshiyaar kaun kare

tum to ho jaan ik zamaane kii
jaan tum par nisaar kaun kare

aafat-e-rozgaar jab tum ho
shikva-e-rozgaar kaun kare

apni tasbeeh rahne de zaahid
daana daana shumaar kaun kare

hijr mein zeher kha ke mar jaaoon
maut ka intizaar kaun kare

aankh hai tark-e-zulf hai sayyaad
dekhen dil ka shikaar kaun kare

vaada karte nahin ye kahte hain
tujh ko ummeed-vaar kaun kare

daag ki shakl dekh kar bole
aisi soorat ko pyaar kaun kare
Sent from goo.gl/JepuR0


अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको
मैं हूँ तेरा तो नसीब अपना बना ले मुझको।

मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के माने
ये तेरी सादा-दिली मार ना डाले मुझको।

ख़ुद को मैं बाँट ना डालूँ कहीं दामन-दामन
कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको।

बादाह फिर बादाह है मैं ज़हर भी पी जाऊँ क़तील
शर्त ये है कोई बाहों में सम्भाले मुझको।


अपनी आँखों के समंदर में उतर जाने दे,
तेरा मुजरिम हूँ मुझे डूब के मर जाने दे ।

ऐ नए दोस्त मैं समझूँगा तुझे भी अपना,
पहले माज़ी का कोई ज़ख़्म तो भर जाने दे ।

आग दुनिया की लगाई हुई बुझ जाएगी,
कोई आँसू मेरे दामन पर बिखर जाने दे ।

ज़ख़्म कितने तेरी चाहत से मिले हैं मुझको,
सोचता हूँ कि कहूँ तुझसे मगर जाने दे


आँखों से मेरे इस लिए लाली नहीं जाती,
यादों से कोई रात खा़ली नहीं जाती।

अब उम्र ना मौसम ना रास्‍ते के वो पत्ते,
इस दिल की मगर ख़ाम ख्‍़याली नहीं जाती।

माँगे तू अगर जान भी तो हँस कर तुझे दे दूँ,
तेरी तो कोई बात भी टाली नहीं जाती।

मालूम हमें भी हैं बहुत से तेरे क़िस्से,
पर बात तेरी हमसे उछाली नहीं जाती।

हमराह तेरे फूल खिलाती थी जो दिल में,
अब शाम वहीं दर्द से ख़ाली नहीं जाती।

हम जान से जाएंगे तभी बात बनेगी,
तुमसे तो कोई बात निकाली नहीं जाती ।


अपने होंठों पर सजाना चाहता हूँ,
आ तुझे मैं गुन गुनाना चाहता हूँ,

कोई आँसू तेरे दामन पर गिरा कर,
बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ,

थक गया मैं करते करते याद तुझको,
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ,

जो बना वायस मेरी नाकामियों का,
मैं उसी के काम आना चाहता हूँ,

छा रहा है सारी वस्ती पे अँधेरा,
रौशनी को घर जलाना चाहता हूँ,

फूल से पैकर तो निकले बे-मुरब्बत,
मैं पत्थरों को आज़माना चाहता हूँ,

रह गयी थी कुछ कमी रुसवायिओं में
फिर क़तील उस दर पे जाना चाहता हूँ,

आखिरी हिचकी तेरे जाने पे आये,
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ ।


हर एक रूह में एक ग़म छुपा लगे हैं मुझे
ये ज़िन्दगी तो कोई बद-दुआ लगे है मुझे

जो आँसू में कभी रात भीग जाती है
बहुत क़रीब वो आवाज़-ए-पा लगे है मुझे

मैं सो भी जाऊँ तो मेरी बंद आँखों में
तमाम रात कोई झाँकता लगे है मुझे

मैं जब भी उस के ख़यालों में खो सा जाता हूँ
वो ख़ुद भी बात करे तो बुरा लगे है मुझे

मैं सोचता था कि लौटूँगा अजनबी की तरह
ये मेरा गाँव तो पहचाना सा लगे है मुझे

बिखर गया है कुछ इस तरह आदमी का वजूद
हर एक फ़र्द कोई सानेहा लगे है मुझे।


एक क़तरा मलाल भी बोया नहीं गया
वो खौफ था के लोगों से रोया नहीं गया

यह सच है के तेरी भी नींदें उजड़ गयीं
तुझ से बिछड़ के हम से भी सोया नहीं गया

उस रात तू भी पहले सा अपना नहीं लगा
उस रात खुल के मुझसे भी रोया नहीं गया

दामन है ख़ुश्क आँख भी चुप चाप है बहुत
लड़ियों में आंसुओं को पिरोया नहीं गया

अलफ़ाज़ तल्ख़ बात का अंदाज़ सर्द है
पिछला मलाल आज भी गोया नहीं गया

अब भी कहीं कहीं पे है कालख लगी हुई
रंजिश का दाग़ ठीक से धोया नहीं गया।


सीने में जलन..

सीने में जलन, आँखों में तूफ़ान-सा क्यों है
इस शहर में हर शख़्स परेशान-सा क्यों है

दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूँढे
पत्थर की तरह बेहिस-ओ-बेजान-सा क्यों है

तन्हाई की ये कौन-सी मंज़िल है रफ़ीक़ो
ता-हद्द-ए-नज़र एक बियाबान-सा क्यों है

हमने तो कोई बात निकाली नहीं ग़म की
वो ज़ूद-ए-पशेमान, परेशान-सा क्यों है

क्या कोई नई बात नज़र आती है हममें
आईना हमें देख के हैरान-सा क्यों है।


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